Nov 13, 2013

उत्थान और पतन


आज से पाँच हज़ार वर्ष पहले इस सारे संसार पर क्षत्रियों का शासक था। केवल पाँच हज़ार वर्ष मे हमारा इतना पतन हुआ की आज संसार मे सुई की नोक रखने बराबर हमारा शासन नहीं। शासन आते हैं और चले जाते हैं। ये कोई बड़े पतन का सूचक नहीं है, लेकिन आज से पाँच हज़ार बरस पहले तक इस संसार के सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी,तपस्वी और योद्धा वीर-शूरवीर क्षत्रिय समाज मे थे। आज ना हमारे पास शोर्य है ना पराकर्म है ना ज्ञान है और ना तपस्या। आज पंद्रह मिनिट खड़े रहने से ही पांच सात शूरवीर धरासाई हो जाते हैं , ये हमारी शारीरिक स्थिति है। मानसिक स्थिति ये है की हमे कोई कितना ही अच्छा कहता रहे हमारे भेज्जे मे वो बात घूसेगी ही नहीं। हमे इन पतन और पराभव के कारणों को ढूँढना पड़ेगा। हम चाहें जैसा जीवन जीना चाहे जिये और क्षत्रिय बने रहें ये संभव नहीं। भगवान राम के काल मे बाल्मीकी जी के आश्रम में राम लक्ष्मण और सीता बनवास काल मे दस वर्ष तक रहे। वो वरुण के वंशज बाल्मीकी ,उनके वंशज भील आज किस स्थिति मे जीवन जी रहे हैं ? ना उन्हे खाने का सलीका ना पीने का  और ना बोलने और उठने-बैठने का। उनके इस आचरण का पतन कैसे हुआ ?

जब किसी भी समाज का पतन होता है तो सबसे पहले वो समाज अपने धर्म को भूल जाता है। स्वधर्म क्या है उसको पहचानने की कोशिश नहीं करता और पाखंडी धर्मों को अपनाकर अपने धर्म को तिलांजलि दे देता है और तब उसके पास उत्थान का जो पहला साधन स्वधर्म होता है वो उसके हाथ से निकल जाता है। धर्म के नाम पर पाखंड में वो ठगा जाता है जिससे उसको ना सांसरिक और ना आध्यात्मिक  क्षेत्र किसी प्रकार का लाभ मिलता है। इस तरह वो अपने स्वधर्म को बिलकुल भूल जाता है और फिर उसका पूरा समाज अपने इतिहास तक को भूल जाता है। संसार मे सायद ही कोई ऐसा समाज हो जिसके इतिहास मे हमारे जीतने महापुरुष पैदा हुये हों, और विभिन्न क्षेत्रों मे , ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसके अंदर हमारा महापुरुष पैदा नहीं हुआ और जिसने पूरे संसार मे अपनी ख्याति प्राप्त नहीं की हो।

रोज दस हज़ार सैनिकों को मौत के घाट उतारने वाला भीष्म  पितामह क्षत्रिय समाज मे पैदा हुआ और चींटी को भी मत मारो ये अहिंसा का उपदेश देना वाला भी क्षत्रिय समाज मे ही पैदा हुआ था। ज्ञान,तपस्या,वीरता तक की हमने प्रकाष्ठाएं  तोड़ दी। संसार मे आज तक विश्वामित्र से लंबी तपस्या करने वाला तपस्वी पैदा नहीं हुआ। ज्ञान के क्षेत्र मे उपनिषद कहते हैं की क्षत्रियों ने सबसे पहले अपने स्वधर्म  का ज्ञान पैदा किया और अपनी तपस्या से उस ज्ञान का विकास किया और उसके बाद तीनों वर्णो को उनके धर्म का ज्ञान करवाया।

--श्री देवी सिंह महार (उपदेश)



 



 

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