Nov 20, 2011

हमारी भूलें : गुण दोषों के सम्यक ज्ञान का अभाव

जीवन के विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने आपको सहज सरल बनाये रखे| नियंत्रणों के माध्यम से व्यक्ति पर यदि बोझ ढोया जाएगा, तो वुक्ति अपनी स्वाभाविकता को खो देगा| इस समझ को खोकर व्यक्ति ने अपने आप पर अत्यधिक धार्मिक, सामाजिक व राजनैतिक बंधन थोप लिए है| यह बंधन जैसे जैसे बढते गए, मनुष्य का जीवन अधिक जटिल व कलुषित होता चला गया| बंधनों से मुक्ति हेतु प्रयत्न करना जीव का स्वभाव है| जब अस्वाभाविक तरीकों से उसके विकास का प्रयत्न किया जाएगा, परिणाम निश्चित रूप से विपरीत निकलेगा| हमने समाज व व्यक्ति के पतन को रोकने के लिए प्रतिबंधों को दिन प्रतिदिन कठोर करना प्रारंभ कर दिया, जिससे पतन की गति रुकी नहीं बल्कि और बढती गयी| अत: अब आवश्यकता इस बात की है कि प्रतिबंधों के चक्कर से बचकर जीवन को पुन: सरल व हल्का होने की अनुमति प्रदान की जाय| यह तभी हो सकता है, जब गुण-दोषों के बारे में सम्यक ज्ञान हो|

भगवान में छ: गुणों का विकास बताया गया है| इन गुणों को विकसित करने के लिए छ: दोषों का दमन नहीं,उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है| प्रत्येक दोष पर नियंत्रण प्राप्त करने पर एक गुण का विकास का स्वत: हो जाता है| व्यक्ति व समाज के विकास की जितनी सहज व सरल यह प्रक्रिया है, जिसका विस्मृत कर हम जटिलताओं में फंसकर बोझिल होते जा रहे है|
(१) पहला दोष है “काम”- प्रचलित भाषा में काम का अर्थ लोग स्त्री प्रसंग ही समझते है| जबकि इसका प्रयोजन कामना से है| जो वास्तु प्राप्त नहीं हुई है, उसकी इच्छा को काम कहते है| काम की उत्पत्ति संकल्प से होती है व सेवन करने से यह निरंतर बढ़ता रहता है| आसक्ति रहित होने से व सेवन का त्याग करने से यह तत्काल नष्ट हो जाता है| काम से उत्पन्न होने वाले दोष है, शिकार खेलना, जुआ खेलना,शराब पीना, स्त्री प्रसंग, दिन में सोना, पर निंदा करना, नाचना, गाना व बजाना व व्यर्थ घूमना| इन दोषों से रहित होने पर मनुष्य में एश्वर्य रूपी गुण का विकास होता है| शास्त्रों के अनुसार दंड को धारण करना व नीति के अनुसार प्रजा का पालन करना ही एश्वर्य है| शील,धर्म,सत्य,सदाचार,बल व लक्ष्मी इसके अंग है|

(२) दूसरा दोष है “क्रोध”- क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है व दूसरे के दोष देखने से बढ़ता है| क्षमा से इसका बढ़ाव रुकर यह धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है| क्रोध से उत्पन्न होने वाले दोष है वाणी की कटुता, उग्रता, मारपीट करना, शरीर को कैद कर देना, त्याग देना, आर्थिक हानि पहुँचाना, चुगली, अति साहस, द्रोह ईर्ष्या व दोष दर्शन| इन दोषों पर जो विजय प्राप्त कर लेता है, उसमे गुण, रूप, धर्म की स्थापना होती है| धर्म की परिभाषा करना संभव नहीं| पितामह भीष्म ने कहा है कि मिटटी को लगातार पीसते रहने पर वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती है, उसी प्रकार तपस्या व धर्म पर आरूढ़ रहने से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्व निरंतर विकसित होते चले जाते अहि, फिर भी यह कहा जा सकता है कि शील को धारण करने पर धर्म का तत्व स्वत: ही समझ में आने लगता है| मन, वाणी व शरीर से किसी भी प्राणी के साथ दोह न करे, सब पर दया करें व उत्तम पात्र को दान से, यही शील है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है|

(३) तीसरा दोष है “मद”- उत्तम कुल, अधिक जानकारी व एश्वर्य के अभिमान से, मद मनुष्य पर सवार हो जाता है| वास्तविकता अर्थात अपने आपको मात्र निमित जानने से मद तुरंत उतर जाता है| यश की व्याख्या करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि यह स्वत: विकसित होने वाली क्रिया है| शास्त्रकारों ने यश के विषय में लिखा है, “फूलों की पवित्र एवं मनोहर सुगंध बिना बोले ही महक कर अनुभव में आती है तथा सूर्य भी बिना कुछ कहे ही आकाश में सबके समक्ष प्रकाशित हो जाता है| इसी प्रकार संसार में बहुत सी ऐसी वस्तुएँ है; जो बोलती नहीं, किन्तु अपने यश से प्रकाशित होती रहती है|”

(४) चौथा दोष है “लोभ”- प्राप्त हुई वास्तु की अधिक से अधिक संख्या में पाने की इच्छा को लोभ कहते है| प्राणियों में भोगों के प्रति जो लोभ देखा जाता है, वह अज्ञान ही के कारण है, लोभ से ही पाप, अधर्म व दुःख का जन्म होता है| भोगों की क्षणभंगुरता को देखने व जानने से उसकी निवृति हो जाती है| पूर्वजन्मों के पुण्यों के क्षीण हो जाने पर व्यक्ति में जब मानसिक व बौद्धिक दरिद्रता व्याप्त होती है, तो वह भूख के भय से घबराकर लोभ का आश्रय लेने लगता है| इस लोभ पर विजय प्राप्त करने पर “श्री” नामक गुण का विकास होता है| लक्ष्मी व कांटी “श्री” के ही स्वरुप है| पितामह भीष्म के अनुसार “श्री” धर्म शील पुरुषों के भेष में, नगर में व घर में तथा युद्ध में पीठ न दिखाकर विजय से सुशोभित न होने वाले सुर वीरों के शरीर में सदा प्रतिष्ठित रहती है|

(५) पांचवा दोष है “ मोह”- मोह अज्ञान से उत्पन्न होता है| व पाप के अभ्यास से बढ़ता है| महात्मा पुरुषों के सत्संग से यह धीरे धीरे नष्ट हो जाता है| स्वभाव, जिसके वसीभूत होकर व्यक्ति मोह पाश में बंधता चला जाता है| केवल संत पुरुषों के संग से ही बदला जा सकता है| इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है| मोह पर विजय प्राप्त करने पर ही ज्ञान रूपी गुण का उदय होता है| ज्ञान व प्रकाश तप का फल है| भीष्म कहते है , “ जैसे आकाश में चिडियाओं के व जल में मछलियों के चलने के चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते, उसी प्रकार ज्ञानियों की मति का भी किसी को पता नहीं चलता|” हृदय की गहराई से उत्पन्न होने वाले ज्ञान तत्व को पूरी तरह प्रकट करना व्यक्ति की सामर्थ्य के बाहर है| अत: ज्ञान का केवल अनुभव किया जा सकता है| वास्तव में जिसे ज्ञान कहा जाता है वह ज्ञान नहीं, बल्कि ज्ञान के नजदीक की कोई वास्तु है जिसके आश्रय से व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त कर सकता है|

(६) छटा दोष है “मात्सर्य”- सत्य का त्याग व दुष्टों का संग करने व ईर्ष्या भाव से इसकी उत्पत्ति होती है| तथा सत्पुरुषों का संग अथवा सेवा करने से इसकी नवरीति संभव है| “मात्सर्य” पर विजय प्राप्त करने पर वैराग्य रूपी गुण की उत्पत्ति होती है| योग से जिन ऐश्वर्यों अथवा सिद्धियों की प्राप्ति होती है| उनकी अवहेलना करके पूर्ण विरक्त हो जाना अथवा पूर्णरूप से आसक्ति का त्याग कर देना ही वैराग्य है|
इन छ: दोषों पर विजय प्राप्त कर, छ: गुणों को उपार्जित करना प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है| इस कार्य में जो जितने अंशों तक सफल होता है, उसको संसार में उतने ही अंश में मान, सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्ति होती है| फिर भी यदि लोग प्रतिबंधों को ही धर्म का अंग समझने लगें तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|

लेखक : श्री देवीसिंह महार

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