Jan 29, 2012

श्री रामसिंहजी भाटी "पंचाणो" : संक्षिप्त परिचय

क्षत्रियवंश के अनुपम शौर्य एवं पराक्रम का इतिहास है। क्षत्रिय कुल में प्रमुख वंश सोम वंश है जिसे चंद्रवंशी भी कहते है या कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी वंश में अवतार लेकर धर्म एवं न्याय की पुनः स्थापना की। भगवान श्रीकृष्ण की परम्परा में (भाटी) हुए। भाटियों ने युगों तक प्रजा को सुशासन देकर क्षय से त्राण करने के क्षत्रिय शब्द को सार्थक किया।

धर्म,धरा और क्षात्र


धर्म के अनुपम आदर्शों हेतु असंख्य बलिदान एवं जौहर-शाके कर भाटियों ने (भाटी) नाम को उज्जवल किया। भाटियों का राज्य विस्तार व्यापक रहा है। जैसलमेर भाटियों का अंतिम पड़ाव रहा है। जैसलमेर पर भाटियों ने दीर्घकाल तक शासन कर भारतवर्ष की आक्रमणकारियों से सदा रक्षा की है, यहाँ का अजेय दुर्ग इस बात का मौन साक्षी है। इसी तरह जहाँ-जहाँ भाटियोँ ने अपना राज्य-विस्तार किया वहाँ अभी भी एतिहासिक साक्ष्य पूर्वजों की यश गाथाएँ गा रहे है। इतिहास में भाटियोँ को (छत्राला यादवपति ' एवं 'उतर भङ किवाङ भाटी ) के विङदों से नवाजा गया है।

रामसिंहजी पंचाणोत


महारावल श्री मालदेवजी जिन्होंने तीसरे शाके के बाद ढाई दिन में वापिस किले पर कब्जा कर लिया था उनकी पीढी में श्री खेतसिंह जी के पंचाणदासजी के रामसिंहजी व पृथ्वीराजसिंह हुए। श्री रामसिंह बङे ही वीर एवं प्रतापी योद्धा थे। उन्होंने अपने जीवन में कई लङाईयाँ लङी और विजय प्राप्त की थी। प्रजा रामसिंह को (पतशाह) कह कर पुकारती थी|

रामसिंह जी ने सबलसिंह को महारावल स्थापित करना;जैसलमेर के अयोग्य महारावल श्री रामचंद्र को पदचयुत कर श्री खेतसिंह जी के पौत्र व अपने चचेरे भाई श्री सबलसिंह को महारावल बनाने में मुख्य भूमिका निभाई ।इस संबंध मे निम्न गीत उलेखनीय है-
वर्ग वालिया तिके रामसीध वालिया,
कोट उठाय लियो तठे कहियो ।

कटक मे कितराइकर कोठा करां रामसीध रामसींध होय रयो ॥1॥
दहुंवे हे रामसींध वहुवें हे दूजल पीठ दल रामसींध रहयो भङ गाज ।

रहयो खेगाल फौजा विच रामसींध जूजवे अणी रम राव ॥2॥
शहर लूटे तटे छै राम सींध बड गयंद तिथा बंका देय वाय ।

प्रथीप लाया रामसींध पांचवत पांचवत रामसींध है पतशाया॥3॥
गंढाँ ग्रहण जैसलगरो साहियाँ खाग करतार सारे ।
बात होवे सो रामसीध विचारे नीतो मारको राम दशो देश मारे ॥4॥


रामसिंह जी को जैसलमेर राज्य की दक्षिणी सीमा पर तैनात किया गया इनके वंशज इसी क्षेत्र में आज भी बसते हैँ जो दक्षिणी बसियाँ भी कहलाती है।

पोखरण क्षेत्र विजय :

मारवाङ क्षेत्र पर आक्रमण कर पोखरण व आस पास क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर जैसलमेर का राज्य विस्तार किया व बीकानेर महाराजा श्री करणीसिंह की मध्यस्थता से भाटी राठौङौ का समझौता कराया।
मुल्तान के शाह पर विजय :
श्री रामसिंहजी ने मुल्तान के शाह को पराजित कर अपनी धाक का परिचय दिया। शाह बार-बार जैसलमेर राज्य की सीमाओँ का अतिक्रमण कर लूटमार करता था। इस पर सभी भाटी सामंतोँ की आपात बैठक कर महारावल श्री मनहर जी ने मुल्तान के शाह को दबाने का श्री रामसिंह को सौंपा। श्री रामसिंह जी ने भाटी सेना के साथ शाह को परास्त कर दंड व लूट का माल लेकर जैसलमेर पधारे ।

टांकले राव रामसिंह पर विजय :
श्री रामसिंहजी बड़े ही स्वाभिमानी एवं गोत्र के रखवाले थे ,उन्होंने यादव रामसिंह की सहायता के लिए टांकलेराव रामसिंह को हरा कर दंड स्वरूप उसकी पुत्री का विवाह यादव रामसिंह से कराया तथा उसके अहंकार को चकनाचूर कर दिया। यादव के टांकलेराव की डाली हुई नथ निकाल कर श्री भाटी ने अर्थ दंड कर राव को जीवनदान दिया था ।
श्री रामसिंह जी के वंशज :
रामसिंह जी के पाँच पुत्र हुए । इस संबंध मे निम्न दोहा प्रचलित है ।
करमेति कुनता जैसी,जाया पांडव जैस।
अखो,तेजो,उदलो, दूरजण ने कानेस ॥


श्री अखेराजजी के वंशज गाँव -हरसाणी,मगरा,गोरङिया,फोगेरा,ताणूरावजी,ताणूमानजी,दुधोङा,जानसिंह की बेरी,टावरकी,तुङबी में रहते है श्री तेजमालजी के वंशज,रणधा,तेजमालता,व मोढा मे रहते है श्री उदयसिंहजी के वंशज गाँव जिझनीयाली,कुंडा,बईया,सिहङार,देवङा व भाडली मेँ रहते है श्री दूरजणसिंहजी के गाँव गजेसिंह का गाँव व चेलक मेँ तथा श्री कानसिंह जी के वंशज गाँव -तभणीयार में रहते है। श्री पृथ्वीराज जी के वंशज जोगीदास का गाँव व नवातला में बसते हैं
श्री रामसिंह जी का देहांवसान कांसाऊ में विक्रम संवत् 1777मिति जेठ सुदी पंचमी सोमवार को हुआ , सोढीराणी श्रीमती केसर दे जी साथ मे सती हूँई ॥
श्री राघवपुरी जी की गादी:
श्री रामसिंहजी के गुरु स्वामी जी श्री राघवपुरी जी जो श्री दयालपुरी जी के शिष्य थे ।श्री रामसिंह का दाह संस्कार श्री राघवपुरी जी की समाधि की गोद मेँ हुआ ।कांसाऊ में गुरु की छतरी व श्री सिंह का देवल बना हुआ था जो संवत् 2063 की बाढ़ मे धस गई. जिसका समस्त पंचाणहोत द्वारा पुननिर्माण संवत् 2066 मिति चेत्र सुदी 6 को पुरा किया गया|

श्री रामसिंह जी के गुरु श्री महाराज राघवपुरी जी जो सिद्ध पुरुष थे उन्होंने पाँच जगह -कांसाऊ ,केशुला,रतेऊ,पांचे की बेरी व धायासर कुँआ(लक्ष्मणा) में समाधि ली॥ इनकी शिष्य परम्परा -श्री सुंदरपुरी जी समाधि कांसाऊ ,शिष्य-श्री वरधपुरी जी -समाधि कांसाऊ,शिष्य-श्री रतनपुरी जी जिन्होंने कांसाऊ छोड़ स्वामी का गाँव बसाया वहाँ पर क: श्री कल्याणपुरीजी,श्री सुगालपुरीजी,श्री
गिरधरपुरीजी श्री बादलपुरीजी,श्री विशनपुरीजी , श्री हिरापुरीजी व वर्तमान में श्री ऊतमपुरीजी गादीपति है
पुजय दादाजी व दादा गुरु जी को शत-शत नमन।
लेखक: भ.लालसिंह भाटी,बईया

2 comments:

surendar singh bhati tejmalta said...

बहुत आभार शेखावत सा आपका हम राम्सिन्होत तेजमालोत भाटी है तेजमालता के हुकुम इनके देवल कांसाउ का अपने जिक्र किया है वहीँ पर हम रहते है

gajendra singh said...

अछि जानकारी है भाटी वंस की