Nov 15, 2011

हमारी भूलें : हठवादिता

संसार का कोई भी व्यक्ति या समाज नहीं, कोई भी भौतिक पदार्थ या विचारधारा तक भी अगर यह हाथ धारण करले ले कि वह जैसे है, वैसे ही बने रहेंगे तो यह असंभव बात होगी| परिवर्तन व विकास सृष्टि के आवश्यक अंग है| संसार में कोई भी इस से बचकर नहीं रह सकता| इस सनातन सत्य की उपेक्षा कर हम हठवादी विचारधारा व हठवादी सामाजिकता पर कायम रहना चाहते है, जसका परिणाम विनाश के अलावा और कुछ नहीं हो सकता| क्योंकि जो स्वयं बदलने के लिए तैयार नहीं है, उसको प्रकृति स्वयं नष्ट कर देती है|

जिस प्रकार उद्यान में माली नित्य सफाई,कांट छांट करता है, उसी प्रकार सामाजिक कार्यकर्ताओं का दायित्व है कि वे समाज में जो भी अनावश्यक चीजें उत्पन्न हो गयी है, उनको समय-समय पर निकाल कर बाहर करते रहे है| अगर इस परम्परा का निर्वाह नहीं किया जाए तो उद्या भी जंगल में बदल जायेगा तथा विकसित समाज भी समय पाकर जंगली जातियों में बदल जायेगा|

मजबूत पकड़ तथा श्रद्धा किसी भी व्यक्ति व समाज के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिसका प्रयोजन है कि जिस वस्तु का परिक्षण किया जा रहा है, उसके सिद्धांत पर दृढ़ता पूर्वक विश्वास करके कार्य क्षेत्र में मजबूती के साथ आगे बढ़ना| नवीन कार्य के संपादन व नवीन उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए इन गुणों की आवश्यकता है| लेकिन आज लोग हठवादिता को, इन गुणों का बाना पहनाकर, आपकी दुष्प्रवृतियों व सामाजिक बुराइयों को नहीं छोड़ने के लिए सैद्धांतिक आधार तैयार कर लेते है|

नया विचार व्यक्ति के मष्तिक में तब ही प्रवेश कर सकता है, जब वह अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर किसी भी बात को पूर्ण रूचि के साथ सुनने को तैयार हो| अगर यह विचार उचित प्रतीत हो तो उसे इस विचार को अपने मस्तिष्क में स्थान देने के लिए जगह देनी होगी| अत: यह आवश्यक हो जायेगा कि मस्तिष्क में से उन अनावश्यक विचारों को बाहर निकाला जावे, जिनकी अब कोई आवश्यकता नहीं है| विचारधारा के विकास का यही क्रम है|

समाज में जो भी रीती-रिवाज प्रचलित है, उनमे से जब तक अनुपयोगी रीतिरिवाजों को छोड़ा नहीं जायेगा तब तक नए उपयोगी रिवाजों को ग्रहण करने के लिए जगह नहीं बन सकेगी| अत: सामाजिक कार्यकर्ता का यह परम दायित्व है कि वे केवल संगठन के बवंडर में ही नहीं फंसे रहे, बल्कि समाज में जो कुरीतियाँ व्याप्त हो गयी है, उनको खोजें तथा उनको मिटाने के लिए यत्नपूर्वक प्रयास करें| इस प्रकार खाली हुई जगह को नवीन विचारों, जो समयानुकूल व उपयोगी हो, उनसे भरने का प्रयास करे| ऐसा नहीं कर पाने के कारण ही, जब सामाजिक कार्यकर्ता व उनके स्वयं परिवारों को ही सामाजिक कुरुतियों से भरा हुआ देखते है तो उनके विचारों को ग्रहण करने के प्रति पर्याप्त रूचि उत्पन्न नहीं हो पाती|

आज आवश्यकता है कि व्यक्तिगत विकास अर्थात स्वयं का विकास व सुधार,समाज के निर्माण यां उसके विकास व सुधार के साथ साथ चलाया जावे| अगर दोनों क्रमों में से एक भी पिछड़ा तो वह विकास की और बढ़ने वाले को खा जाएगा| एक चत्रिवान व्यक्ति व ईमानदार व्यक्ति सामाजिक कुरुतियों से पीटकर समाज में अपमानित होने व मुर्ख कहलाने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा| इसी प्रकार अगर सामाजिक संगठन उच्च आदर्शों की केवल बातें करते रहे व व्यक्तियों के चरिते-निर्माण विचारधारा के अनुकूल नहीं हुए, तो एक दिन घटिया लोग अपने ही नेताओं को खा जायेंगे, वे स्वयं तो निकम्में है ही| इसलिए सब कुछ बना बनाया ढांचा कुछ ही समय में नष्ट हो जायेगा|

यह सब तभी संभव है, जबकि व्यक्ति व समाज अपनी हठवादिता का परित्याग कर समय की आवश्यकता व अपनी आवश्यकताओं को समझे| प्रकाश की हर नई किरण को उत्सुकता के साथ देखें| उसे तुरंत ग्रहण करने के लिए प्रति क्षण तैयार रहें| जिस समाज में ऐसा हो सकता है, उसके विकास को कोई भी नहीं रोक सकता| इसी भाव को दूसरे शब्दों में उदारता कहते है, जो क्षत्रिय में सबसे अधिक आवश्यक है|

लेखक : श्री देवीसिंह महार
श्री देवीसिंह जी महार एक क्षत्रिय चिन्तक व संगठनकर्ता है आप पूर्व में पुलिस अधिकारी रह चुकें है क्षत्रियों के पतन के कारणों पर आपने गहन चिंतन किया है यहाँ प्रस्तुत है आपके द्वारा किया गया आत्म-चिंतन व क्षत्रियों द्वारा की गयी उन भूलों का जिक्र जिनके चलते क्षत्रियों का पतन हुआ |



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1 comment:

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

बहुत खूबसूरती से आपने सच को उजागर किया है;