Mar 2, 2010

जिधर से भी गुजरता हूँ

जिधर से भी गुजरता हूँ मुझे आवाज है आती |
यहाँ गुलशन गए मुरझा मगर खुसबू नहीं जाती ||

पुकारो न सोई घाटियाँ , यहाँ पर वीर सोते है , यहाँ .....
कैसे रोकलूं आंसू यहाँ इतिहास रोते है ,
यहाँ इतिहास रोते है |

जहाँ पर भी नजर डालूं दबी इक टीस तडफती
जलो ए दीप प्राणों के यहाँ परवाने जलते है , यहाँ ....
न जाने कितने दिल यहाँ अब भी मचलते है ,
यहाँ अब भी मचलते है |

कोई धड़कन अभी तक रक्त से साँसों को नहलाती || जिधर....
जलाने को काफी है यहाँ का एक भी शोला , यहाँ ....
हर पत्थर किसी की याद करके के पड़ गया पीला,
देख लो पड़ गया पीला |

यहाँ सुन एक भी धिक्कार मुझे तो कंपकंपी आती !! जिधर ...
मेरे तक़दीर खुश हो तो लुटादे अपनी मस्ती , लुटादे ......
नहीं मालूम बहारें फिर मिटाने आये हस्ती को ,
मिटाने आये मस्ती को |

जब तक तू नहीं आये , किसे रंगरेलियां भाती || जिधर ....
श्री उम्मेद सिंह, खिदासर
२३ अप्रेल १९५९


सुख और स्वातंत्र्य -4

11 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त...आभार श्री उम्मेद सिंह जी की रचना प्रस्तुत करने का.

Suman said...

nice

नरेश सिह राठौङ said...

सुन्दर रचना है |

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब रचना, आभार.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही खुब सुरत कविता
धन्यवाद

usha said...

hmmmmmmmmm.... no words

usha said...

hmmmmmmmmm.... no words

jugraj-juliyasar said...

Shree Tan Singh Ji ki rachana
बहुत ही खुब सुरत कविता
धन्यवाद

Jugraj_JU\uliyasar said...

बहुत ही खुब सुरत कविता
धन्यवाद

jagmohan singh said...

incredible.......

jagmohan singh said...

very nice....incredible...