May 25, 2009

जय चन्द राठौड़ पर लगे मिथ्या आरोप

कुछ लोग जिनमें इतिहासकार भी शामिल है जयचंद को हिन्दू साम्राज्य का नाशक कहकर उससे घरना प्रकट करते है | और कुछ उनके पौत्र सीहा जी पर पल्लीवाल ब्राहमणों को धोखे से मार कर पाली पर अधिकार करने का कलंक लगाते है | वास्तव में देखा जाए तो इसे लोग इन कथाओं को "बाबा वाक्य प्रमाणं " समझ कर ,या ‘पृथ्वीराज रासो ' में और कर्नल टोड के " राजस्थान के इतिहास ' में लिखा देख कर ही सच्ची बात मान लेते है लेकिन वास्तविकता पर गौर नहीं करते है |

पृथ्वीराज रासो के अनुसार जयचंद ने वि.स. ११४४ में 'राजसूय यज ' और संयोगिता का स्वंयवर करने का विचार किया, तब प्रथ्वी राज ने विघ्न डालने के उद्देश्य से खोखन्द पुर में जाकर जयचंद के भाई बालुक राय को मार डाला और बाद में संयोगिता का हरण कर लिया, इससे लाचार होकर जयचंद को युद्घ करना पडा | यह युद्घ ११५१ में हुआ | उसके बाद पृथ्वीराज संयोगिता के मोह पाश में बंध गया और राज कार्य में शिथिल पड़ गया | इन्ही परिस्थितियों को कर शहाबुद्धीन ने देहली पर फिर चढाई की |पृथ्वीराज सेना लेकर मुकाबले में आ गया | इस युद्ध में शहाबुद्धीन विजयी हुआ | पृथ्वीराज पकडा गया | और गजनी पहुँचाया गया जहा पर शहाबुद्धीन और पृथ्वीराज दोनों मारे गए | कुतुबुद्धीन उनका उत्तराधिकारी बना | कुतुबुद्धीन ने आगे बाधा करा कनौज पर चढाई की जयचंद युद्ध में मारा गया | और मुसलमान विजयी हुए |

इस उपरोक्त कथा में जिस यज्ञ व स्वयंवर का वर्णन किया है उसके बारे में जयचंद के समय की किसी भी प्रशस्तियो मे नहीं है | जयचंद के समय के १४ ताम्र पात्र और २ लेख मिले है इनमें अंतिम लेख वि.स. १२४५ का है | रासो मे जिस संयोगिता के हरण की बात कही गयी है वह काल्पनिक है क्यों की इसका उल्लेख ना तो पृथ्वीराज के समय बने ‘पृथ्वीराज विजय महाकाव्य’ मे ही मिलता है और न ही वि.स. की चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे बने ’हम्मीर महाकाव्य’ मे ही मिलता है इसी हालत मे इस कथा पर विश्वास करना अपने आप को धोखा देना है रासो मे शहाबुद्धीन के स्थान पर कुतुबुद्धीन का जयचंद पर चढाई करना लिखा है | परन्तु फारसी तवारिखो के अनुसार यह चढाई शहाबुद्धीन के मरने के बाद न होकर उसकी जिन्दगी मे हुयी थी| स्वय शहाबुद्धीन ने इसमें भाग लिया था उसकी मृत्यु वि.स. १२६२ मे हुयी थी इसके अलावा किसी भी फारसी तवारिखो मे जयचंद का शहाबुद्धीन से मिल जाना नहीं लिखा है |

यदि ‘रासो’ की सारी कथा सही भी मान ले तब भी उसमे संयोगिता हरण के कारण जयचन्द का शहाबुद्धीन को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने का निमंत्रण देना या उससे किसी प्रकार का सम्पर्क रखना कही भी लिखा हुआ नही मिलता है । इसके विपरीत उसमे स्थान स्थान पर पृथ्वीराज को परायी कन्याओ का अपहरणकर्ता बताया गया है । जिससे उसकी उद्दण्डता ,उसकी कामासक्ति का वर्णन होने से उसकी राज्य कार्य में गफ़लत ,उसके चामुण्ड राय जैसे स्वामी भक्त सेवक को बिना विचार के कैद में डालने की कथा से उसकी गलती ,और उसके नाना के दिए राज्य में बसने वाली प्रजा के उत्पीड़न से कठोरता ही प्रकट होती है | इसी के साथ उसमे पृथ्वीराज के प्रमाद से उसके सामंतो का शहाबुद्धीन से मिल जाना भी लिखा है |

एसी हालत मे विचार शील विद्वान स्वंय सोच सकते है कि जयचन्द को हिन्दू साम्राज्य का नासक कह कर कलंकित करना कहाँ तक न्यायोचित है ।

रासो के समान ही ‘आल्हाखण्ड’मे भी संयोगिता के स्वयंवर का किस्सा दिया हुआ है । परंतु उसके रासो के बाद की रचना होने से स्पष्ट ज्ञात होता है कि उसके लेखक ने रासो का ही अनुसरण किया है इस लिये उसकी कथा पर भी विश्वास नही किया जा सकता है ।

जयचंद कनौज का अन्तिम हिन्दू प्रतापी राजा था | उसने ७०० योजन (५६०० मील) भूमि पर विजय प्राप्त की | जयचंद नेअनेक किले भी बनवाये थे इन में से एक कनौज में गंगा के तट पर ,दूसरा असीई ( जिला इटावा) में यमुना के तट पर ,तीसराकुर्रा में गंगा ले तट पर - शेष अगले भाग में |
सौजन्य से - (राठौङो का इतिहास लेखक विश्वनाथ रेवु )

13 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

नि्श्व्चय ही आपका आलेख अभी तक जनसाधारण मे प्रचलित बातों के विपरीत साक्ष्य सहित लिखने का अच्छा प्रयत्न है.

आपके आगे के आलेख मे यह जानना रोचक रहेगा कि असली घटना क्रम कैसे और क्या था?

इंतजार करते हैं.

रामराम.

Udan Tashtari said...

बहुत रोचक आलेख. काफी कुछ जानकारी मिली. आभार आपका.

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

शाहबुद्दीन का नाम पहली बार सुन रहा हूँ. जो कुछ पढ़ा है उसके अनुसार पृथ्वीराज का युद्ध मुहम्मद गोरी के साथ हुआ था.

----- आर्श्चयजनक तथ्य

अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.

धन्यवाद

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत अच्छा आलेख ! जयचंद जैसे वीर को कुछ इतिहासकारों ने बदनाम कर दिया यदि प्रथ्विराज के खिलाफ जयचंद ने मुहम्मद गौरी का साथ दिया भी तो ऐसे उदहारण इतिहास में भरे पड़े है ! काश इन दोनों योद्धाओं में आपसी दुश्मनी नहीं होती तो इतिहास कुछ और ही होता !
नरेश जी ,अभी तक जहाँ भी पढ़ा है प्रथ्विराज के साथ मोहम्मद गौरी के युद्ध हुए है शहाबुद्दीन का नाम पहली बार पढ़ रहा हूँ कृपया स्पष्ट करे |

गिरिजेश राव said...

अरे भाई, मुहम्मद गोरी का प्रथम नाम शहाबुद्दीन था.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

प्रथ्वी राज चौहान और जयचंद राठौर की लडाई की वजह कुछ भी हो . इतिहास तो जयचंद को ही दोषी बताता है .

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर जानकारी दी आप ने हम ने तो स्कुल की किताबो मे कुछ ओर ही पढा था, आगे की कडी का इन्तजार रहेगा.

Kiran Rajpurohit Nitila said...

bahut acchi jankari di.itihas me kisi ki galat chavi ko sudhar kar sach samne lana bhi bahut puny ka kam ho sakta hai.ye ab jana.
hamari shubhkamnaye __

डा.मान्धाता सिंह said...

बहुत अच्छी जानकारी। इतिहास में जानबूझकर अंग्रेजों के डाले गए भ्रमात्मक तथ्यों को भी उजागर करता है।

Ranveer Singh Shekhawat said...

पृथ्वीराज चौहान और जयचंद के बारे मेँ अलग अलग मत है इतिहास को तोङ मरोङ कर लिखा गया है

Anonymous said...

Ham aapki bat se sahmat hain

pvmishra said...

शायद आपने उचीत ही लिखा है, लेकिन कोई साक्ष्य उपल्बध नहीं है और शाहबुद्दीन का पूरा नाम ही शाहबुद्दीन मुहम्मद गोरी था...

surendar singh bhati tejmalta said...

बहुत अच्छी जानकारी सायद लोगो का भरम दूर हो जाये शेखावत सा