Apr 10, 2009

बलि पथ के सुंदर प्राण

बलि पथ के सुंदर प्राण |
बलि होना धर्म तुम्हारा,
जीवन हित क्यों पय पान ||

आज खडा तू मंदिर आगे,
देव पुरुष के है भाग्य जागे |
टूट रहे है जग के धागे ||
मत मांग अभय वरदान ||१||
जीवन है कर्तव्य की कहानी,
चंद दिनों की मस्त जवानी |
मर कर चख ले रे अज्ञानी ||
कर ले पुरे अरमान ||२||
दीपक की बलि है जलने में,
फूलों की बलि है खिलने में |
बलि होता स्वच्छ सलिल झरने में ||
कह बलिदान चाहे कल्याण ||३||
वीर पूंग्वो की धरनी पर ,
प्रेममई भारत जननी पर |
यज्ञ भूमि दुःख ताप हरनि पर ||
अब जलने दो श्मशान ||४||
श्री तन सिंह बाड़मेर
२४ मार्च १९५०

9 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

इस लाजवाब रचना को पढवाने लिये आभार आपका. बहुत नायाब रचना है.

रामराम.

mehek said...

bahut hi sunder

नरेश सिह राठौङ said...

बलिदान से ही जग सुन्दर बन सकता है बिना त्याग व बलिदान के कुछ भी पाना संभव नही है । तन सिंह जी कि यह रचना बहुत ही सुन्दर है ।

Anonymous said...

वाह रतन भाई वीर रस में डूब गया मैं तो!

प्रकाश बादल!

Babli said...

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

Babli said...

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

प्रकाश बादल said...

रतन भाई ये लेख मुझे भाई रतन राठौड ने ईमेल के ज़रिये भेजा है और मुझे पढ़कर अच्छा लगा राजस्थान के बारे में बहुत सी जानकारी आपके ब्लॉग से मिलती है और आपके ब्लॉग की सामग्री बहुत ही रोचक है और साज सज्जा भी। शुभकामनाएँ।

Kiran Rajpurohit Nitila said...

bahut sundar, bahti jaldhara si kavita.
yah blog Rajasthan ki bahut acchi jankari deta hai.Rajasthan sadaiv se sabke aakrashan ka kandra raha hai.iski sanskrati or shaan sabme bepanah josh bhar deti hai.
iski sabhi post padhkar mann gadgad ho jata hai ki hum is dhara ki santane hai.
sadhuwad

Kiran Rajpurohit Nitila said...

jaruur dekhe

www.bhorkipehlikiran.blogspot.com