Apr 5, 2009

आराम कहाँ

आराम कहाँ अब जीवन में अरमान अधूरे रह जाते |
दिल की धड़कन शेष रहे हाथों के तोते उड़ जाते ||

तिल-तिल कर तन की त्याग तपस्या का अमृत संचय करते |
अमिय भरे रस कुम्भ कभी यदि माया की ठोकर खाते ||

सागर में सीपें खोज-खोज माला में मोती पोये थे |
पर हाय ! अचानक टूट पड़े यदि प्रेम तंतु जब पहनाते ||

घोर अँधेरी रात्रि में था दीप जला टिम-टिम करता |
अंधेर हुआ जब बह निकला नैराश्य पवन मग में चलते ||

निर्जीव अँगुलियों के चलते स्वर साधक बनना सीखा था |
मादक वीणा के टूट चुके हों तार अभागे हा ! बजते ||

बचपन में बाहें डाल चले सोचा था साथी है जग में |
दो कदम चले फिर बिछुड़ गए एकाकी को आराम कहाँ ?
श्री तन सिंह ,बाड़मेर
११ अगस्त १९४९

8 comments:

mehek said...

सागर में सीपें खोज-खोज माला में मोती पोये थे |
पर हाय ! अचानक टूट पड़े यदि प्रेम तंतु जब पहनाते ||

घोर अँधेरी रात्रि में था दीप जला टिम-टिम करता |
अंधेर हुआ जब बह निकला नैराश्य पवन मग में चलते ||

waah sunder mann chuti rachana,padhwane ka shukran

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लिखा है ... बधाई।

राज भाटिय़ा said...

बचपन में बाहें डाल चले सोचा था साथी है जग में |
दो कदम चले फिर बिछुड़ गए एकाकी को आराम कहाँ ?
वाह वाह बहुत सुंदर.
धन्यवाद

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

निर्जीव अँगुलियों के चलते स्वर साधक बनना सीखा था |
मादक वीणा के टूट चुके हों तार अभागे हा ! बजते ||

नरेश सिह राठौङ said...

बहुत सुन्दर रचना है । श्री तन सिंह जी ने बहुत सी सुन्दर रचनाये लिखी है । आपके माध्यम से यह अब सभी पाठको को पढ़ने को मिल रही है । आपका बहुत बहुत आभार ।

ताऊ रामपुरिया said...

बचपन में बाहें डाल चले सोचा था साथी है जग में |
दो कदम चले फिर बिछुड़ गए एकाकी को आराम
कहाँ ?

बहुत मधुर और सुंदर रचना.

रामराम.

श्यामल सुमन said...

आराम कहाँ अब जीवन में अरमान अधूरे रह जाते |
दिल की धड़कन शेष रहे हाथों के तोते उड़ जाते ||

सुन्दर पँक्तियाँ। कहते हैं कि-

उसे फिक्र है हरदम नया तर्जे जफा क्या है।
हमें शौक है देखें सितम की इन्तहा क्या है।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Babli said...

बहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !