Feb 17, 2009

इतिहास की चोटों का

इतिहास की चोटों का एक दाग लिए फिरते है |
सीने के घराने में इक दर्द लिए फिरते है ||

हम भूल नही सकते महमूद तेरी गजनी |
अब तक भी आंखों में वह खून लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

बाबर तेरे प्याले टूटे बता कितने ?
पर सरहदी का अफ़सोस लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

झाला था इक माना कुरम था इक माना |
सोने के लगे जंग पै अचरज लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है |||

कर्जन तेरी दिल्ली में अनमी था इक राना |
सड़कों पे गिरे ताजों के रत्न चुगा फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है |||

आपस में लड़े भाई गैरों ने हमें कुचला |
अब मिलकर लड़ने का अरमान लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||

5 comments:

डा.मान्धाता सिंह said...

bahut achchha.बहुत बढ़िया रचा है।

ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब रचना. बहुत बधाई.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

आपस में लड़े भाई गैरों ने हमें कुचला |
अब मिलकर लड़ने का अरमान लिए फिरते है ||
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है |||
बहुत ही सुंदर, क्या बात है, जबाब नही, हर लाईन एक अलग कहानी कहती है.
धन्यवाद

नरेश सिह राठौङ said...

बहुत अछी रचना है । इसकी जितनी तारीफ़ कि जाये कम है । अच्छी रचना का सही जगह प्रयोग किया गया है ।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

इतिहास की चोटों से सबक नही सीखा हमने .आज भी नही सुधरे है हम