Feb 10, 2009

राजस्थान के लोक देवता श्री पाबूजी राठौङ-भाग ३ (अन्तिम भाग)


गुजरात राज्य मे एक स्थान है अंजार वैसे तो यह स्थान अपने चाकू,तलवार,कटार आदि बनाने के लिये प्रसिद्ध है । इस स्थान का जिक्र मै यहाँ इस लिये कर रहा हूं क्यों कि देवल चारणी यही कि वासी थी । उसके पास एक काले रंग की घोडी थी । जिसका नाम केसर कालमी था । उस घोडी की प्रसिद्धि दूर दूर तक फैली हुई थी। उस घोडी को को जायल (नागौर) के जिन्द राव खींची ने डोरा बांधा था । और कहा कि यह घोडी मै लुंगा । यदि मेरी इच्छा के विरूद्ध तुम ने यह घोडी किसी और को दे दी तो मै तुम्हारी सभी गायों को ले जाउगां ।
एक रात श्री पाबूजी महाराज को स्वप्न आता है और उन्हें यह घोडी(केशर कालमी) दिखायी देती है । सुबह वो इसे लाने का विचार करते है । और अपने खास सरदार चान्दा जी, डेमा जी के साथ अंजार के लिये कूच करते है । देवल चारणी उनकी अच्छी आव भगत करती है और आने का प्रयोजन पूछती है । श्री पाबूजी महाराज देवल से केशर कालमी को मांगते है । देवल उन्हें मना कर देती है और उन्हें बताती है कि इस घोडी को जिन्द राव खींची ने डोरा बांधा है और मेरी गायो के अपहरण कि धमकी भी दी हुइ है । यह सुनकर श्री पाबूजी महाराज देवल चारणी को वचन देते है कि तुम्हारी गायों कि रक्षा कि जिम्मेदारी आज से मेरी है । जब भी तुम विपत्ति मे मुझे पुकारोगी अपने पास ही पाओगी । उनकी बात सुनकर के देवल अपनी घोडी उन्हें दे देती है ।
श्री पाबूजी महाराज के दो बहिन होती है पेमल बाइ व सोनल बाइ । जिन्द राव खींची का विवाह श्री पाबूजी महाराज कि बहिन पेमल बाइ के साथ होता है । सोनल बाइ का विवाह सिरोही के महाराज सूरा देवडा के साथ होता है । जिन्द राव
शादी के समय दहेज मे केशर कालमी कि मांग करता है । जिसे श्री पाबूजी महाराज के बडे भाइ बूढा जी द्वारा मान लिया जाता है लेकिन श्री पाबूजी महाराज घोडी देने से इंकार कर देते है इस बात पर श्री पाबूजी महाराज का अपने बड़े भाइ के साथ मनमुटाव हो जाता है ।
अमर कोट के सोढा सरदार सूरज मल जी कि पुत्री फूलवन्ती बाई का रिश्ता श्री पाबूजी महाराज के लिये आता है । जिसे श्री पाबूजी महाराज सहर्ष स्वीकार कर लेते है । तय समय पर श्री पाबूजी महाराज बारात लेकर अमरकोट के लिये प्रस्थान करते है । कहते है कि पहले ऊंट के पांच पैर होते थे इस वजह से बरात धीमे चल रही थी । जिसे देख कर श्री पाबूजी महाराज ने ऊंट के बीच वाले पैर के नीचे हथेली रख कर उसे उपर पेट कि तरफ धकेल दिया जिससे वह पेट मे घुस गया । आज भी ऊंट के पेट पैर पांचवे पैर का निशान है ।
इधर देवल चारणी कि गायो को जिन्दा राव खींची ले जाता है | देवल चारणी काफी मिन्नते करती है लेकिन वह नही मानता है , और गायो को जबरन ले जाता है | देवल चारणी एक चिडिया का रूप धारण करके अमर कोट पहुच जाती है | अमर कोट में उस वक्त श्री पाबूजी महाराज की शादी में फेरो की रस्म चल रही होती है तीन फेरे ही लिए थे की चिडिया के वेश में देवल चारणी ने वहा रोते हुए आप बीती सुनाई | उसकी आवाज सुनकर पाबूजी का खून खोल उठा और वे रस्म को बीच में ही छोड़ कर युद्ध के लिए प्रस्थान करते है | (कहते है उस दिन से राजपूतो में आधे फेरो का ही रिवाज कल पड़ा )
पाबूजी महाराज अपने जीजा जिन्दराव खिंची को ललकारते है | वहा पर भयानक युद्ध होता है | पाबूजी महाराज अपने युद्ध कोशल से जिन्दराव को परस्त कर देते है लेकिन बहिन के सुहाग को सुरक्षित रखने के लिहाज से जिन्दराव को जिन्दा छोड़ देते है |सभी गायो को लाकर वापस देवल चारणी को सोप देते है और अपनी गायो को देख लेने को कहते है | देवल चारणी कहती है की एक बछडा कम है | पाबूजी महाराज वापस जाकर उस बछड़े को भी लाकर दे देते है |
रात को अपने गाँव गुन्जवा में विश्राम करते है तभी रात को जिन्दराव खींची अपने मामा फूल दे भाटी के साथ मिल कर सोते हुओं पर हमला करता है | जिन्दराव के साथ पाबूजी महाराज का युद्ध चल रहा होता है और उनके पीछे से फूल दे भाटी वार करता है | और इस प्रकार श्री पाबूजी महाराज गायो की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देते है | पाबूजी महाराज की रानी फूलवंती जी , व बूढा जी की रानी गहलोतनी जी व अन्य राजपूत सरदारों की राणियां अपने अपने पति के साथ सती हो जाती है | कहते है की बूढाजी की रानी गहलोतनी जी गर्भ से होती है | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार गर्भवती स्त्री सती नहीं हो सकती है | इस लिए वो अपना पेट कटार से काट कर पेट से बच्चे को निकाल कर अपनी सास को सोंप कर कहती है की यह बड़ा होकर अपने पिता व चाचा का बदला जिन्दराव से जरूर लेगा | यह कह कर वह सती हो जाती है | कालान्तर में वह बच्चा झरडा जी ( रूपनाथ जो की गुरू गोरखनाथ जी के चेले होते है ) के रूप में प्रसिद्ध होते है तथा अपनी भुवा की मदद से अपने फूफा को मार कर बदला लेते है और जंगल में तपस्या के लिए निकल जाते है |
पाठक मित्रो को बोरियत से बचाने के लिये कथा को सीमित कर दिया गया है । पिछली पोस्ट मे कही टिप्पणी करते हुये ताऊ ने पूछा कि गोगा जी अलग थे क्या ? जवाब मे अभी मै इतना ही कहूंगा कि गोगाजी चौहान वंश मे हुये थे श्री पाबूजी महाराज के बड़े भाई बूढा जी कि पुत्री केलम दे के पती थे । गोगाजी चौहान के बारे मे विस्तार से अगली पोस्ट मे लिखूगां । अब चलते चलते पाबूजी महाराज कि शादी का एक विडियो भी हो जाये

video

7 comments:

PN Subramanian said...

पाबूजी महाराज की कहानी अच्छी लगी. हम जैसे लोगों के लिए एक समस्या है. राजस्थान में लोक कथाएँ इतनी अधिक हैं कि उन्हें याद रखना कठिन लगता है. हमें कभी कभी लगता है कि शान्ति पूर्वक उन्होंने जीवन यापन किया ही नहीं. या यों कहें कि हमेशा संघर्ष का जीवन ही जिया. आभार.

Ratan Singh Shekhawat said...

नरेश जी , लोक देवता के बारे में बहुत अच्छी जानकारी लायें है ! स्व. तन सिंह जी ने भी पाबू जी पर एक लेख लिखा था ! तन सिंह जी की लेखन की अपनी अलग शैली हुआ करती थी मै कल ही वो लेख टाइप करने की सोच रहा था और आज उस लेख से भी ज्यादा जानकारी मिल गई | साथ ही राजपूत समाज में 7 की जगह 4 फेरे होने की वजह का भी पता चला हालाँकि मुझे भी इस बारे में यही जानकारी थी लेकिन आपके लेख से इसकी और अच्छी तरह से पुष्ठी हो गई |

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आपके चिट्ठे पर आकर राजस्थान की लोक संस्कृ्ति के बारे में विस्तार से जानने का अवसर प्राप्त हुआ.
श्री पाबू जी महाराज के बारे में बहुत बढिया जानकारी प्रदान की आपने.मैने बहुत पहले इनका नाम शायद किसी पुस्तक में पढा था. अगर मै गलत न हूं तो शायद इनका राजस्थान के'करोलू' नामक स्थान से कोई सम्बंध अवश्य है.

ravindra singh said...

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Thanks
Ravindra Singh Rathore

prem said...

राजस्थान की लोक संस्कृ्ति के बारे में विस्तार से जानने का अवसर प्राप्त हुआ.
श्री पाबू जी महाराज के बारे में बहुत बढिया जानकारी प्रदान की आपने.मैने बहुत पहले इनका नाम शायद किसी पुस्तक में पढा था.
basantdevasi

prem said...

राजस्थान की लोक संस्कृ्ति के बारे में विस्तार से जानने का अवसर प्राप्त हुआ.
श्री पाबू जी महाराज के बारे में बहुत बढिया जानकारी प्रदान की आपने.मैने बहुत पहले इनका नाम शायद किसी पुस्तक में पढा था.
BASANT DEVASI

अचलसिँह देवराज आसरलाई से said...

नरेश जी को और उन सहयोगियोँ को मेरा नमस्कार और जय श्री माताजी कि अर्ज होवे ! आप सभी ने इस साईट पर बहूत अच्छा काम किया है ।कृपया इसे और भी रोचक बनाने का प्रयास करेँ । और तो इस साईट की क्या तारीफ करुँ क्योँकि तारीफ के शब्द भी कम पङ रहे हैँ ।धन्यवाद ॥
अचलसिँह s/o पेँहपसिँह राठौङ v/p आसरलाई त. शेरगढ , जोधपुर (राज.)